हाईकोर्ट के फैसले को ठहराया गलत
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बेटियों का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार किसी पुराने पारिवारिक बंटवारे से खत्म नहीं हो सकता। यदि पिता की मृत्यु बिना वसीयत के होती है तो बेटी को क्लास-1 वारिस के रूप में संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलेगा, चाहे बेटों के बीच पहले से ही बंटवारा क्यों न कर लिया गया हो।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल बेटों के बीच किया गया संपत्ति का बंटवारा, पिता की संपत्ति में बेटियों के उत्तराधिकार के अधिकारों को खत्म नहीं कर सकता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने यह फैसला कर्नाटक के एक पारिवारिक संपत्ति विवाद में दिया। पीठ ने कहा है कि 2005 में किया गया संशोधन बेटियों को सहभाजक यानी कॉपार्सनरी अधिकार देता है, लेकिन इससे पहले से मौजूद उत्तराधिकार के अधिकार खत्म नहीं होते। पिता की संपत्ति में अधिकार कानून रूप से चलता रहता है।
मौजूदा मामला बीएम सीनप्पा नामक व्यक्ति की संपत्ति से जुड़ा है। उनकी वर्ष 1985 में बिना वसीयत के मृत्यु हो गई थी। उनके परिवार में पत्नी, तीन बेटियां और चार बेटे थे। पिता की मृत्यु के बाद बेटों ने पहले मौखिक रूप से और फिर वर्ष 2000 में एक पंजीकृत विभाजन पत्र के जरिये संपत्ति का बंटवारा कर लिया। इस बंटवारे में बेटियों को शामिल नहीं किया गया और न ही उन्हें कोई हिस्सा दिया गया। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में
इसके बाद वर्ष 2007 में बेटियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मांगा। उन्होंने दावा किया कि उनके पिता की मृत्यु बिना वसीयत के हुई थी, इसलिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के तहत वे भी बराबरी की हकदार हैं। प्रतिवादियों ने अदालत में तर्क दिया कि वर्ष 2000 का बंटवारा 20 दिसंबर 2004 से पहले हो चुका था, इसलिए वह हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 (5) के तहत सुरक्षित है। इसी आधार पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेटियों का मुकदमा खारिज कर दिया था।
फैसला ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा
शीर्ष अदालत ने कहा है कि धारा 6 (5) केवल उन पुराने बंटवारों को 2005 संशोधन के प्रभाव से बचाती हैं, जो पहले ही हो चुके थे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बेटियों का स्वतंत्र उत्तराधिकार अधिकार खत्म हो जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि बेटी का अधिकार केवल जन्म से मिलने वाले कॉपार्सनरी अधिकार तक सीमित नहीं है बल्कि वह अपने पिता की संपत्ति में क्लास-1 उत्तराधिकारी के रूप में भी बराबर की हिस्सेदार है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह तय करना कि पुराना बंटवारा वैध है या बेटियों पर लागू होता है, एक तथ्यात्मक विवाद है जिसका फैसला ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होगा। अदालत ने कर्नाटक हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामले को फिर से ट्रायल कोर्ट में भेज दिया और निर्देश दिया कि संपत्ति की वर्तमान स्थिति में कोई बदलाव न किया जाए