प्रधानों को प्रशासक बनाने का मामले पर अब सभी याचिकाओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में होगी सुनवाई, मुख्य न्यायमूर्ति ने चार पीआईएल को लखनऊ पीठ से इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजने का दिया आदेश
लखनऊ। प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने को चुनौती देने वाली हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में दाखिल जनहित याचिकाओं पर अब इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई होगी। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली ने लखनऊ पीठ में दाखिल चार जनहित याचिकाओं को सुनवाई के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजने का आदेश दिया है।
यह आदेश राज्य सरकार के आग्रह पर दिया गया है। लखनऊ पीठ में ओम प्रकाश प्रजापति पंचायत राज ग्राम प्रधान संगठन, आशीष कुमार सिंह और संजय कुमार शर्मा द्वारा दाखिल चार जनहित याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी। 3 अगस्त को राज्य सरकार ने इनमें हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में अपना जवाब दाखिल कर दिया था। साथ ही सरकार ने मामले में मांगा गया ब्योरा भी पेश कर दिया था।
पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त को निर्धारित की थी। इससे पहले राज्य सरकार ने मामले को लखनऊ पीठ से इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित करने की अर्जी भी दाखिल कर दी। इस अर्जी पर 6 अगस्त को सुनवाई के बाद मुख्य न्यायमूर्ति ने चारों याचिकाओं को सुनवाई के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजने का आदेश दिया।
पंचायत चुनाव की तैयारी दो साल पहले शुरू करे सरकार', समय पर चुनाव न होने से चिंतित हाईकोर्ट ने कहा, समयसीमा में चुनाव जरूरी
मौजूदा पंचायत चुनावों में हो रही देरी के कारणों का परीक्षण करेगा हाई कोर्ट
लखनऊ : इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने प्रदेश में पंचायत चुनाव समय से कराने की प्रक्रिया में हुई देरी पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है कि अगली बार पंचायत चुनाव कराने की प्रक्रिया कार्यकाल समाप्त होने से कम से कम दो वर्ष पहले शुरू की जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने पर ही संविधान के अनुच्छेद 243-ई में निर्धारित पांच वर्ष की अवधि के भीतर पंचायत चुनाव कराना संभव हो सकेगा। न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ ने संजय कुमार शर्मा की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि इस बार राज्य सरकार ने चुनाव प्रक्रिया मई-2025 में शुरू की थी। इसके बावजूद अब तक पंचायत चुनाव नहीं हो सके हैं। पंचायतों का पांच वर्ष का संवैधानिक कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो चुका है।
पीठ ने राज्य सरकार से रिकार्ड तलब किए हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि मौजूदा पंचायत चुनाव पांच वर्ष की अवधि समाप्त होने से पहले क्यों नहीं कराए जा सके। कोर्ट ने कहा कि वह यह भी देखना चाहता है कि चुनाव कराने में देरी के पीछे राज्य सरकार के नियंत्रण से बाहर की कोई परिस्थिति थी या फिर सरकार ने समय पर चुनाव कराने के अपने दायित्व का निर्वहन नहीं किया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 243-ई के तहत पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है और इसके समाप्त होने से पहले नए चुनाव कराना आवश्यक है। पीठ ने कहा कि इस संवैधानिक व्यवस्था का पालन सुनिश्चित करने के लिए चुनाव प्रक्रिया पर्याप्त समय पहले शुरू करना जरूरी है।
पीठ ने यह भी कहा कि उसने चुनाव प्रक्रिया में देरी से संबंधित कुछ इलेक्ट्रानिक रिकार्ड देखे हैं और इन रिकार्ड को अगली सुनवाई पर फिर अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। अदालत इन रिकार्ड के आधार पर यह भी जांचेगी कि मई-2025 में प्रक्रिया शुरू किए जाने के बावजूद चुनाव समय पर क्यों नहीं कराए जा सके। मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त को होगी।
पिछड़ा आयोग और वोटर लिस्ट के कारण टाला गया पंचायत चुनाव, हाईकोर्ट में यूपी सरकार का जवाब
5 अगस्त 2026
प्रयागराज। सूबे में पंचायत चुनाव समय पर न हो पाने के पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन के कारण आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया आयोग की संस्तुतियों पर निर्भर है। दूसरा, राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की तिथि 10 जून 2026 निर्धारित किए जाने के कारण 26 मई 2026 से पूर्व पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं था। यह खुलासा राज्य सरकार ने पंचायत चुनाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित जनहित याचिका पर दाखिल जवाब में किया है।
एडीसी के विधि छात्रों युधिष्ठिर वर्मा एवं आयुष पांडेय की जनहित याचिका में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद समय पर चुनाव न कराए जाने को चुनौती दी है। जनहित याचिका में कहा गया है कि पंचायतों का संवैधानिक कार्यकाल समाप्त होने के बाद निर्वाचित ग्राम प्रधानों को उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम 1947 की धारा 12 (3-ए) के तहत प्रशासक नियुक्त किया जाना संविधान के अनुच्छेद 243-ई की भावना के विपरीत है।
अपने जवाब में राज्य सरकार ने चुनाव में हुई देरी का कारण पिछड़ा वर्ग आयोग की प्रक्रिया और राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन को तिथि को भी चुनाव न करा पाने का आधार बनाया है। राज्य सरकार के इस विस्तृत जवाब पर अगले सप्ताह में मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली एवं क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई होगी। इससे पूर्व याचियों को राज्य सरकार के काउंटर एफिडेविट का बिंदुवार उत्तर प्रस्तुत करना है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने के मामले की याचिका पर सुनवाई छह सप्ताह के लिए टाली, जानिए क्यों?
13 जुलाई 2026
प्रयागराज । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने के मामले की याचिका पर सुनवाई छह सप्ताह के लिए टाल दी है। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने कहा कि इसी समान मामले की सुनवाई हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में दो न्यायाधीशों की बेंच कर रही है। ऐसी स्थिति में इस स्तर पर एकल पीठ में सुनवाई संभव नहीं है।
पिछली सुनवाई पर सिद्धार्थ नंदन ने अरविंद न्यायमूर्ति राठौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए 25 और 26 मई के उन सरकारी आदेशों पर सवाल उठाया था, जिनसे चुनाव टाले गए थे। कोर्ट ने कहा था कि ये आदेश अधिनियम 1947 की धारा 12 (3-ए) के तहत किए गए थे, जिसे प्रमोद लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने पहले ही असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 243 ई और 243 के के तहत पंचायतों का कार्यकाल पांच साल का निश्चित होता है। ऐसे में चुनाव समय पर होने चाहिए। राज्य सरकार ने ओबीसी आयोग की रिपोर्ट लंबित होने को देरी का कारण बताया। इस पर कोर्ट ने हैरानी जताई कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद ओबीसी आयोग ने अब तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की है।
निरस्त अध्यादेश नहीं, बल्कि संशोधित अधिनियम के तहत बनाए गए प्रशासक
प्रधानों के मामले में हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखेगी सरकार, पंचायतीराज विभाग ने न्याय विभाग से लिया परामर्श
01 जुलाई 2026
लखनऊ। प्रदेश सरकार ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने के मामले में हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखेगी। सरकार का कहना है कि प्रधानों को वर्ष 2000 में रद्द अध्यादेश के आधार पर नहीं बैठाया गया है। यह नियुक्ति विधानसभा में पारित अधिनियम के आधार पर हुई है, जिसे अदालत ने कभी असांविधानिक नहीं बताया। उच्चपदस्थ सूत्रों के मुताबिक, इस संबंध में पंचायतीराज विभाग ने न्याय विभाग से परामर्श ले लिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने 25 जून के अपने आदेश में कहा है कि असांविधानिक हो चुके नियमों के तहत ग्राम प्रधान प्रशासक की भूमिका नहीं निभा सकते हैं। साथ ही सरकार को 13 जुलाई तक चुनाव की रूपरेखा पेश करने का आदेश दिया है। न्याय विशेषज्ञों का कहना है कि हाईकोर्ट ने वर्ष 2000 में प्रेम लाल पटेल बनाम स्टेट ऑफ यूपी व अन्य के मामले में उस अध्यादेश को असांविधानिक घोषित किया था, जिसमें समय पर चुनाव न होने पर ग्राम पंचायतों में प्रशासक बैठाने की व्यवस्था दी गई थी।
इसके बाद प्रदेश सरकार ने विधानसभा में प्रस्ताव लाकर पंचायतीराज अधिनियम 1947 में संशोधन कर दिया। इस संशोधन के तहत ही पंचायतीराज विभाग ने ग्राम पंचायतों में प्रशासक के रूप में ग्राम प्रधानों को बैठाया है।
कानूनविदों का कहना है कि पंचायतीराज अधिनियम में किए गए इस संशोधन को कभी किसी अदालत ने खारिज नहीं किया। साथ ही मौजूदा परिस्थितियों में समर्पित ओबीसी आयोग को आरक्षण संबंधी अपनी सिफारिशें देने में समय लगेगा, इसलिए उस अवधि में प्रशासक बैठाने के अलावा कोई और उपाय नहीं है।
उच्चपदस्थ सूत्रों के मुताबिक, अभी इस मामले की सुनवाई अवकाशकालीन एकल पीठ ने की थी। अब सरकार की ओर से नियमित पीठ में पक्ष रखा जाएगा। इसके लिए आवश्यक तैयारियां की जा रही हैं।
कोर्ट ने अंतिम रूप से शून्य घोषित नहीं किया शासनादेश
प्रदेश सरकार ने 25-26 मई के अपने एक आदेश के माध्यम से ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाया है। कानूनविदों का मानना है कि कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि ऐसा लगता है कि यह आदेश अमान्य या शून्य है। उक्त आदेश को अंतिम रूप से शून्य घोषित नहीं किया है। इसलिए सरकार की ओर से एकल पीठ के सामने ही अपना पक्ष रखने पर विचार किया जा रहा है।
13 जुलाई के बाद ही तय होगा जिला और क्षेत्र पंचायतों में प्रशासक कौन, इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील करेगी यूपी सरकार
यूपी पंचायत चुनाव : जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने को अनुचित माना है, कहा- असांविधानिक हो चुके नियमों के तहत नहीं हो सकती तैनाती, चुनाव की रुपरेखा भी मांगी
28 जून 2026
लखनऊ। प्रधानों को प्रशासक नहीं बनाए जाने के हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार अपील करेगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने 25 जून के अपने आदेश में कहा है कि असांविधानिक हो चुके नियमों के तहत ग्राम प्रधान प्रशासक की भूमिका नहीं निभा सकते हैं। सरकार को 13 जुलाई तक चुनाव की रूपरेखा पेश करने का भी आदेश दिया है।
कोर्ट ने आदेश में कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 243 (ई) और 243 (के) के तहत पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। वहीं, शासन के उच्चपदस्थ सूत्रों का कहना है कि उप्र पंचायतीराज अधिनियम 1947 की धारा 12 की उपधारा (3-ए) मुख्य रूप से ग्राम पंचायत के कार्यकाल और चुनाव टलने की असाधारण परिस्थितियों से संबंधित है।
इस धारा के अनुसार, यदि अपरिहार्य परिस्थितियों या लोकहित में ग्राम पंचायत का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव करा पाना संभव न हो तो राज्य सरकार या उसके द्वारा अधिकृत अधिकारी को यह शक्ति होगी कि वह उस अवधि के लिए ग्राम पंचायतों के कार्यों के संचालन के लिए वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था (जैसे प्रशासक या प्रशासनिक समिति की नियुक्ति) कर सके। इस उपधारा के रूप में यह ऐतिहासिक संशोधन प्रदेश में अप्रैल 1994 में लागू हुआ।
हाईकोर्ट ने बाद में प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के केस में व्यवस्था दी है कि इस धारा 12 (3-ए) का उपयोग करके चुनावों को अनिश्चितकाल के लिए टालना या ग्राम प्रधानों या प्रशासकों का कार्यकाल मनमाने ढंग से बढ़ाना असांविधानिक है। चुनाव कराना राज्य निर्वाचन आयोग का सांविधानिक अधिकार है जिसमें राज्य सरकार प्रशासनिक बहाने बनाकर देरी नहीं कर सकती। जानकारों का कहना है कि उप्र पंचायतीराज अधिनियम, 1947 की धारा 12 में जोड़ी गई उपधारा (3-ए) को अब तक हटाया नहीं गया है इसलिए इस कानून का अभी आधार बना हुआ है।
इसी को आधार बनाते हुए सरकार एकल पीठ के खिलाफ अगले सप्ताह डबल बेंच या फुल बेंच में सुनवाई के लिए अपील दायर करेगी। अपील दायर करने के निर्णय की पुष्टि उप्र राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष और इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस राम औतार सिंह ने भी की है।
समर्पित आयोग के बिना नहीं हो सकते चुनाव
जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत ओबीसी समर्पित आयोग की रिपोर्ट के बिना चुनाव नहीं कराए जा सकते हैं। अपील में सरकार इस तथ्य को भी रखेगी। वहीं, मौजूदा परिस्थितियों में जब प्रधानों का कार्यकाल खत्म हो चुका है, इसलिए अगला चुनाव होने तक वैकल्पिक व्यवस्था देना भी जरूरी है।
आयोग को पक्षकार बनाने के आदेश को भी दी जाएगी चुनौती
कोर्ट ने मामले में याची को समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग को भी पक्षकार बनाने की अनुमति दी है। जस्टिस राम औतार सिंह का कहना है कि कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट की धारा-9 के तहत आयोग को किसी मुकदमे में पार्टी नहीं बनाया जा सकता है।
नवंबर तक रिपोर्ट दे पाएगा समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग
राज्य सरकार ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए 18 मई को उप्र राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई अनिवार्य व्यवस्था के तहत आयोग बनाया गया है। इसका मुख्य कार्य राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति और पिछड़ेपन का अध्ययन करना है।
आयोग के अध्यक्ष के अनुसार सभी 75 जिलों के डीएम से पिछड़े वर्ग की आबादी के आंकड़े ले लिए गए हैं। आयोग ने अब तक तीन जिलों मेरठ, हापुड़ और बागपत का दौरा भी कर लिया है। ब्लॉक और गांव स्तर पर जाकर डीएम से मिले आंकड़ों का सत्यापन किया जा रहा है। आयोग अंतिम रिपोर्ट देने से पहले सभी 75 जिलों में भ्रमण करेगा। इसमें 6 माह लगेंगे। हम अपनी रिपोर्ट नवंबर तक दे पाएंगे।
13 जुलाई के बाद ही तय होगा जिला और क्षेत्र पंचायतों में प्रशासक कौन, इलाहाबाद हाई कोर्ट में जवाब देने की तैयारियों में जुटी सरकार
11 को जिला पंचायतों व 19 जुलाई को क्षेत्र पंचायतों का कार्यकाल होगा पूरा
28 जून 2026
लखनऊ : जिला पंचायतों और क्षेत्र पंचायतों में प्रशासक कौन होगा, इस निर्णय को लेकर फिलहाल पेच फंस गया है। पंचायत चुनाव को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में 13 जुलाई को अगली सुनवाई होने के बाद ही सरकार इस मसले पर किसी नतीजे पर पहुंच पाएगी क्योंकि हाई कोर्ट ने ग्राम पंचायतों में निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बनाने के फैसले पर तीखी टिप्पणी की है। ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने के सरकार के निर्णय को कोर्ट ने संविधान के विपरीत ठहराया है। जिला पंचायतों का कार्यकाल 11 जुलाई व क्षेत्र पंचायतों का 19 जुलाई को समाप्त हो रहा है।
पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाने पर प्रदेश सरकार ने निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बना दिया है। प्रधान ही प्रशासक के रूप में ग्राम पंचायतों का कामकाज देख रहे हैं। इन्हें नीतिगत निर्णय लेने और नए कामों को छोड़ ग्राम पंचायत से जुड़े अन्य कामों को करने की छूट दी गई है। नए कामों को कराने से पूर्व इन्हें संबंधित जिलाधिकारी से अनुमति लेनी होगी। सरकार के इस फैसले के बाद माना जा रहा था कि कार्यकाल समाप्त होने पर जिला पंचायतों में जिला पंचायत अध्यक्ष और क्षेत्र पंचायतों में ब्लाक प्रमुखों को सरकार प्रशासक की जिम्मेदारी दे देगी। ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष भी यह मानकर चल रहे थे कि उन्हें ही प्रशासक बनाया जाएगा।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब प्रदेश सरकार हाई कोर्ट द्वारा मांगे गए जवाबों की तैयारी में उलझ गई है। प्रशासक के फैसले पर सरकार अब कोई तात्कालिक निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है। 13 जुलाई को सुनवाई में हाई कोर्ट द्वारा दिए जाने वाले आदेश पर ही अब सबकुछ निर्भर करेगा। सूत्र बताते हैं कि प्रदेश सरकार अब 13 जुलाई के बाद ही जिला पंचायतों और क्षेत्र पंचायतों में प्रशासक बनाने के बारे में कोई निर्णय करेगी। सरकार निवर्तमान जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लाक प्रमुखों को ही प्रशासक बनाएगी या पूर्व की भांति जिला प्रशासन के उच्चाधिकारियों को बनाएगी, यह तभी तय होगा।
प्रधान नहीं हो सकते प्रशासक – हाईकोर्ट, त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव टालने की सरकारी कवायद को झटका, चुनाव की रूपरेखा पेश करने को कहा
कोर्ट ने प्रदेश सरकार से पूछा... किन हालात में अस्तित्वहीन प्रावधानों से प्रशासक नियुक्त किए गए प्रधान
26 जून 2026
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ग्राम पंचायतों के खत्म हो रहे कार्यकाल को बढ़ा कर त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव टालने की सरकारी कवायद को झटका दिया है। कोर्ट ने 13 जुलाई तक सरकार को चुनाव की रूपरेखा पेश करने का आदेश दिया है। साथ ही कहा कि असांविधानिक हो चुके नियमों के तहत ग्राम प्रधान प्रशासक की भूमिका नहीं निभा सकते हैं। कोर्ट ने प्रदेश सरकार से पूछा है कि किन हालातों में अस्तित्वहीन प्रावधानों के तहत ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया गया है। यह आदेश व टिप्पणी न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने सहारनपुर निवासी अरविंद राठौर की याचिका पर दिया है।
उधर, सुनवाई के दौरान राज्य चुनाव आयोग के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि 10 जून 2026 को मतदाता सूची प्रकाशित की जा चुकी है। आयोग चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार है। चुनाव प्रक्रिया केवल राज्य सरकार की ओर से आवश्यक व्यवस्थाएं उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण रुकी हुई है। याची ने ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने वाले 25 और 26 मई को जारी शासनादेशों को रद्द कर समयबद्ध चुनाव कराने के लिए याचिका दाखिल की है।
याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि कार्यकाल खत्म होने के बाद छह माह से ज्यादा चुनाव नहीं टाला जा सकता है। प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने का प्रावधान पहले ही असांविधानिक घोषित हो चुका है। कोर्ट ने याची को ओबीसी कमीशन को भी पक्षकार बनाने की अनुमति दी है।
प्रमुख सचिव से मांगा हलफनामा: कोर्ट ने हैरानी जताते हुए पंचायत राज विभाग के प्रमुख सचिव से हलफनामे के माध्यम से यह स्पष्ट करने को कहा है कि किन परिस्थितियों में अस्तित्वहीन प्रावधान के तहत प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाया गया। साथ ही चेतावनी दी है कि यदि अधिकारी कोई तार्किक कारण नहीं बता सके तो उन्हें अदालत में व्यक्तिगत रूप से हाजिर होना होगा। इसके बाद कोर्ट अवमानना की कार्यवाही पर विचार करेगी।
कोर्ट ने कहा... पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता : कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 243-ई और 243-के अंतर्गत पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता है। समय पर चुनाव कराना अनिवार्य है। 25 और 26 मई 2026 के जिन आदेशों के आधार पर सरकार ने कार्यकाल खत्म होने के बावजूद प्रधानों को ग्राम पंचायत के कार्य संचालन की जिम्मेदारी सौंपी है, वह प्रेम लाल पटेल के मामले में पहले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ के आदेश से असांविधानिक घोषित हो चुके हैं।
सरकार बोली... ओबीसी कमीशन की रिपोर्ट का इंतजार
राज्य सरकार की ओर से अपर स्थायी अधिवक्ता ने दलील दी कि ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया गया है। आयोग जिलों में जाकर आबादी का आंकड़ा जुटाएगा और उसी आधार पर आरक्षण तय होगा। यह प्रक्रिया पूरी करने में समय लग रहा है।
25 व 26 मई को प्रशासक नियुक्त करने का आदेश: इन आदेशों के तहत सरकार ने मौजूदा 57,694 ग्राम प्रधानों को छह माह तक प्रशासक बनाए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इसमें चुनाव होने तक मौजूदा प्रधान नीतिगत मामलों को छोड़कर गांव में सफाई, पेयजल, मनरेगा, सड़क मरम्मत और अन्य जरूरी विकास कार्य संचालित करते रहेंगे। हालांकि, उन्हें कोई भी कार्य कराने के लिए जिला पंचायत राज अधिकारी के जरिये जिलाधिकारी से अनुमति लेनी होगी। जबकि, पहले ग्राम पंचायत का कार्यकाल खत्म होने के बाद यह जिम्मेदारी सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) निभाया करते थे।
26 मई को पूरा हो चुका ग्राम पंचायतों का कार्यकाल : प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो चुका है। जबकि क्षेत्र पंचायतों का कार्यकाल 19 जुलाई और जिला पंचायतों का 11 जुलाई को खत्म होगा।
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