कहा, इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति केवल मुस्लिम बनता है उसे पिछड़े मुस्लिम समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता
नई दिल्ली: मद्रास हाई कोर्ट ने एक अहम और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि मतांतरण से आरक्षण नहीं मिलता। इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति केवल मुस्लिम बनता है, उसे किसी विशेष पिछड़े मुस्लिम समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि मतांतरण करने मात्र से किसी व्यक्ति को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम के तहत आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के नौ मार्च 2024 के सरकारी आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद कर दिया। इसमें मतांतरण करने वालों को बैकवर्ड क्लास मुस्लिम के रूप में मान्यता देने का प्रविधान किया गया था। यह फैसला भविष्य में इसी तरह के मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है। देशभर में मतांतरण और आरक्षण की नीति पर नई बहस को भी जन्म दे सकता है।
यह महत्वपूर्ण फैसला न्यायमूर्ति जीआर स्वामिनाथन और पीबी बालाजी की पीठ ने 25 जून को दिया। हाई कोर्ट ने यह फैसला एक ऐसे मामले में दिया है, जिसमें एक व्यक्ति जिसका जन्म हिंदू परिवार में हुआ था और बाद में उसने इस्लाम अपना लिया था। अपना नाम बदल कर समीर अहमद रख लिया। इस्लाम अपनाने के बाद उसने स्वयं को मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का सदस्य बताते हुए पिछड़ा वर्ग प्रमाण पत्र की मांग की थी। लेकिन तहसीलदार ने आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद उसने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
इस मामले में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने तमिलनाडु सरकार के तीन मार्च 2024 के आदेश (जीओ) को आधार बनाया था, जिसमें आरक्षित श्रेणियों से मतांतरित लोगों को तमिलनाडु में अधिसूचित सात पिछड़े वर्ग के मुस्लिम समूहों में से एक से संबंधित होने का सामुदायिक प्रमाणपत्र जारी किया जा सकता था।
तमिलनाडु सरकार ने अपने आदेश में यह प्रविधान किया था कि अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग या डी-नोटिफाइड समुदायों से आने वाले व्यक्ति यदि इस्लाम धर्म अपनाते हैं तो उन्हें भी बैकवर्ड क्लास मुस्लिम के रूप में आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है। सरकार का तर्क था कि इससे मतांतरण करने वाले व्यक्तियों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे।
लेकिन, हाई कोर्ट ने ये दलील खारिज करते हुए कहा कि आरक्षण का आधार धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन है। कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक श्रेणियों जैसे अनुसूचित जाति (एससी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) को एक साथ मिलाकर नई श्रेणी बनाना संविधान के मूल ढांचे के विपरीत है। कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के ही पुराने 1951 के जी. माइकल बनाम वेंकेटेश्वरन फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि जब कोई हिंदू इस्लाम अपनाता है तो सिर्फ मुस्लिम बनता है और समाज में उसकी जगह इस आधार पर तय नहीं होती कि धर्म बदलने से पहले वह किस जाति का था। इस्लाम अपनाने पर वह किसी जाति का सदस्य नहीं रहता।