शादीशुदा बेटी भी आश्रित कोटे की हकदार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, विवाह होने के बाद मायके से रिश्ता खत्म नहीं होता
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाह किसी बेटी और उसके मायके के बीच के संबंधों को समाप्त नहीं करता। न ही यह मान लेने का आधार हो सकता है कि वह अपने माता-पिता पर निर्भर नहीं रही। शीर्ष अदालत ने कहा है कि निर्भरता एक तथ्यात्मक प्रश्न है जिसका निर्धारण सिर्फ वैवाहिक स्थिति के आधार पर नहीं किया जा सकता।
ये टिप्पणी करते हुए शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया है कि सिर्फ शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को मृत उचित दर दुकान (फेयर प्राइस शॉप) विक्रेता के आश्रित कोटे से दुकान आवंटित करने के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने साफ किया है कि वैवाहिक स्थिति किसी महिला की पात्रता तय करने का आधार नहीं हो सकती और ऐसा करना संविधान के समानता संबंधी प्रावधानों का उल्लंघन है।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने उत्तर प्रदेश की निवासी कुलसुम निशा की अपील स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट, डिप्टी कमिश्नर और एसडीएम के आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत ने संबंधित अथॉरिटी को चार सप्ताह के भीतर कुलसुम निशा के पक्ष में उचित दर दुकान का आवंटन आदेश जारी करने का निर्देश दिया।
आश्रित कोटे की कसौटी आवेदक की निर्भरता होनी चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आश्रित कोटे का उद्देश्य मृतक के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता प्रदान करना है। ऐसे में वास्तविक कसौटी आवेदक की निर्भरता, आर्थिक आवश्यकता, स्थानीय निवास और दुकान चलाने की क्षमता होनी चाहिए, न कि उसका वैवाहिक दर्जा।
क्या है मामला : कुलसुम निशा की मां अमेठी जिले में उचित दर दुकान चलाती थीं। मार्च 2024 में उसकी मृत्यु के बाद कुलसुम ने आश्रित के रूप में दुकान के आवंटन के लिए आवेदन किया था। हालांकि अथॉरिटी ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि वह विवाहित हैं।