गबन के आरोप में सहकर्मियों को वेतन कटौती जैसी हल्की सजा मिली थी
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी उच्च पद पर कार्यरत अधिकारी समान अपराध के लिए निचले पद के कर्मचारियों के बराबर सजा की मांग नहीं कर सकता।
शीर्ष अदालत ने कहा कि पद जितना ऊंचा होता है, जिम्मेदारी और जवाबदेही भी उतनी ही अधिक होती है। उसकी सजा का निर्धारण भी पद के हिसाब से बदल सकती है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को दरकिनार करते हुए पंजाब एवं सिंध बैंक के वरिष्ठ प्रबंधक राज कुमार की सेवा से बर्खास्तगी को सही ठहराया है।
मामले के मुताबिक, वरिष्ठ प्रबंधक ने अपने अधीनस्थ बैंक अधिकारी और एक गनमैन के साथ मिलकर ग्राहकों के पैसे का गवन किया और बैंक रिकॉर्ड में हेरफेर की। जांच में यह आरोप सही पाए गए। इसके बाद बैंक के अनुशासनात्मक अथॉरिटी ने वरिष्ठ प्रबंधक को सेवा से बर्खास्त कर दिया, जबकि सह आरोपियों को वेतन में कमी या अनिवार्य सेवानिवृत्ति जैसी अपेक्षाकृत हल्की सजा दी गई। इसके बाद प्रबंधक ने हाईकोर्ट की शरण ली थी।
हाईकोर्ट ने माना था भेदभाव : हाईकोर्ट ने इस अंतर को अनुच्छेद 14 के तहत भेदभाव मानते हुए वरिष्ठ प्रबंधक की सजा को बर्खास्तगी से बदलकर अनिवार्य सेवानिवृत्ति कर दिया था।
समानता का सिद्धांत हर स्थिति में लागू नहीं होता
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि समानता का सिद्धांत हर स्थिति में एक जैसी सजा लागू करने का आदेश नहीं देता। अदालत ने कहा कि वरिष्ठ प्रबंधक का पद केवल औपचारिक नहीं था बल्कि उसमें अधीनस्थ कर्मचारियों की निगरानी और संस्थान की ईमानदारी बनाए रखने की विशेष जिम्मेदारी शामिल थी।
बड़े अधिकारी से अधिक ईमानदारी की अपेक्षा
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि उच्च पद पर बैठे अधिकारी से अधिक ईमानदारी और जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है। इसलिए उसके द्वारा किया गया कदाचार अधिक गंभीर माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक अथॉरिटी द्वारा दी गई सजा को असंगत या मनमानी नहीं कहा जा सकता। इसलिए इसमें न्यायाल का हस्तक्षेप उचित नहीं था। कोर्ट ने बैंक की अपील स्वीकार करते हुए वरिष्ठ प्रबंधक की बर्खास्तगी को बरकरार रखा है।