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Wednesday, July 15, 2026

सरकारी कर्मचारी को सेवा के दौरान दिव्यांग होने पर नौकरी से नहीं हटा सकते - सुप्रीम कोर्ट, पूर्व जवान को 1.25 करोड़ मुआवजा देने का आदेश, दृष्टिबाधित होने पर सीआरपीएफ ने नौकरी से निकाला था

सरकारी कर्मचारी को सेवा के दौरान दिव्यांग होने पर नौकरी से नहीं हटा सकते - सुप्रीम कोर्ट,  पूर्व जवान को 1.25 करोड़ मुआवजा देने का आदेश, दृष्टिबाधित होने पर सीआरपीएफ ने नौकरी से निकाला था


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा दिव्यांगजन अधिकार कानून, 1995 की धारा 47 का उद्देश्य दिव्यांग कर्मचारियों को समान अवसर और सेवा सुरक्षा देना है। अगर कोई सरकारी कर्मचारी सेवा के दौरान दिव्यांग हो जाता है तो उसे नौकरी से नहीं हटाया जा सकता। बल्कि उसे समान वेतन और सेवा लाभ के साथ किसी अन्य पद पर तैनात किया जाना चाहिए। ऐसा पद उपलब्ध न हो तो उसके लिए अतिरिक्त पद तक बनाया जा सकता है।


शीर्ष कोर्ट ने मंगलवार को यह बात सेवा में रहने के दौरान दृष्टिबाधित हुए सीआरपीएफ के एक चालक (कांस्टेबल) को नौकरी से हटाने को लेकर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) को कड़ी फटकार लगाते हुए कही। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा जिसमें कहा गया था कि सीआरपीएफ ने दिव्यांगजन अधिकार कानून, 1995 की धारा 47 का उल्लंघन किया है।

कोर्ट ने फैसले में कहा कि कानून के अनुसार जवान को सेवा से बाहर करने के बजाय समान वेतन और सुविधाओं के साथ किसी अन्य पद पर समायोजित किया जाना चाहिए था। चूंकि जवान अब सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुका है, इसलिए कोर्ट ने उसे दोबारा नौकरी पर बहाल करने के बजाय 1.25 करोड़ रुपये मुआवजे, बकाया वेतन, ब्याज और मुकदमे के खर्च के रूप में देने का आदेश दिया। अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, कानून ने सीआरपीएफ पर यह जिम्मेदारी दी थी कि कर्मचारी के लिए वैकल्पिक पद तलाशे, न कि कर्मचारी उसके लिए गुहार लगाए।


आदर्श नियोक्ता की भूमिका नहीं निभाई

गर्ट ने कहा कि वैकल्पिक नियुक्ति न देकर सीआरपीएफ ने आदर्श नियोक्ता की भूमिका नहीं निभाई और कल्याणकारी कानून को निष्प्रभावी बना दिया। सीआरपीएफ ने दलील दी थी कि 2002 की एक अधिसूचना के तहत उसके लड़ाकू कर्मियों को धारा 47 के दायरे से बाहर रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह तर्क खारिज करते हुए कहा कि संबंधित जवान को 1998 में चिकित्सकीय रूप से अयोग्य घोषित किया गया था, जबकि अधिसूचना 2002 में आई थी। इसलिए उसे पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता।


बीमारी के कारण चली गई थी एक आंख की रोशनी

सीआरपीएफ का यह जवान वर्ष 1985 में चालक के रूप में भर्ती हुआ था। 1996 में उसे आंखों की गंभीर बीमारी हो गई, जिससे उसकी एक आंख की रोशनी पूरी तरह चली गई और दूसरी आंख की दृष्टि भी प्रभावित हो गई। मेडिकल बोर्ड ने उसे स्थायी रूप से सेवा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया और 11 मार्च 1998 को नौकरी से हटा दिया। बाद में उसने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने माना कि उसे कानून के तहत नौकरी जारी रखने का अधिकार था और बहाली का आदेश दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट कर दिया कि सीआरपीएफ का फैसला कानून के अनुरूप नहीं था।

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