बाल विवाह पर रोक सभी धर्मों पर लागू मुस्लिम पर्सनल लॉ POCSO से ऊपर नहीं - इलाहाबाद हाईकोर्ट
बच्चा किसी भी धर्म का हो, बाल विवाह की बेड़ियों में जकड़ना गैरकानूनी : हाईकोर्ट
बुलंदशहर में दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग वाली 19 लोगों की याचिका खारिज
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चा किसी भी धर्म का हो, व्यक्तिगत कानून की आड़ में बचपन को बाल विवाह की बेड़ियों में जकड़ना गैरकानूनी है। कोर्ट ने कहा कि यह सच है कि कई अदालती गलियारों में व्यक्तिगत कानूनों के मुताबिक विवाह की उम्र को लेकर मतभेद है। हालांकि, हमारी राय में ऐसी शादी बाल विवाह निषेध अधिनियम और पोक्सो अधिनियम के खिलाफ है जो सभी जाति-धर्म के लोगों पर समान रूप से लागू होता है। लिहाजा, सभी धर्मों के लिए बाल विवाह गैरकानूनी है।
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने बुलंदशहर के ककोड़ थाने में दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग वाली 19 लोगों की याचिका खारिज कर दी। आरोप है कि 16 वर्षीय किशोरी का बाल विवाह रुकवाने पहुंची पुलिस और चाइल्डलाइन टीम के साथ याचियों ने मारपीट, गालीगलौज करते हुए सरकारी काम में बाधा डाली थी।
पुलिस की ओर से दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग के साथ याचियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचियों के अधिवक्ता ने दलील दी कि मुस्लिम विधि के मुताबिक 15 वर्ष की आयु के बाद लड़की विवाह करने में सक्षम होती है।
कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। कहा कि देश के प्रत्येक नागरिक के लिए विवाह की आयु वही है जो बाल विवाह निषेध अधिनियम में निर्धारित है। कोई भी व्यक्तिगत कानून इस अधिनियम और पॉक्सो अधिनियम के प्रभाव को समाप्त नहीं कर सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाल विवाह को स्वीकार भी कर लिया जाए तो वैवाहिक रिश्ता होने के कारण यह विवाह पॉक्सो कानून के तहत अपराध है। कोर्ट ने पाया कि मौजूदा मामले में बाल विवाह रोकने के लिए पुलिस और चाइल्डलाइन टीम कानून के तहत अपने कर्तव्य का निर्वहन करने पहुंची थी। इसी दौरान सरकारी कर्मचारियों पर हमला कर सरकारी कार्य में बाधा डाली गई।
यह आरोप प्रथमदृष्टया बेहद संगीन है। इनकी जांच जरूरी है। इसलिए एफआईआर रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए याचियों को मिला अंतरिम संरक्षण भी समाप्त कर दिया।