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Thursday, September 15, 2016

प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को बड़ा झटका, सरकार ही कराएगी कॉउंसलिंग


प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को हाईकोर्ट की ओर से बड़ा झटका लगा है। अब राज्य सरकार ही निजी मेडिकल कॉलेजों की काउंसिलिंग करायेगी। आज हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि निजी मेडिकल कॉलेज खुद अपनी काउंसिलिंग नहीं कर सकेंगे। राज्य सरकार का काउंसिलिंग का फैसला एकदम सही है।
साथ ही यह भी कहा कि
* पहली काउंसलिंग दुबारा करवाई जाए.
* सरकार ही करे सब्सिडी की व्यवस्था, शेष 50% विद्यार्थियों पर इसका बोझ डालना ठीक नहीं

इसके अलावा हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि अल्पसंख्यक कॉलेज केवल 50% ही काउंसिलिंग कर सकेंगे।
कोर्ट ने सरकार से पूछा, गरीब छात्रों के लिए सब्सिडी वाली छूट पर क्या व्यवस्था है

As you already know that :
प्रदेश सरकार ने निजी कालेजों की काउंसिलिंग भी साथ-साथ कराने का फैसला लिया था, किन्तु शुल्क को लेकर मामला फंसा था। इस पर सरकार ने काउंसिलिंग शुरू होने से एक दिन पहले निजी मेडिकल व डेंटल कालेजों की आधी सीटें नीट काउंसिलिंग के माध्यम से सरकारी फीस पर भरने का फैसला लिया था।
इसके बाद,
36 हजार सालाना फीस पर अखिलेश सरकार के खिलाफ कोर्ट गये प्राइवेट मेडिकल कॉलेज

प्रदेश के 24 निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की 3100 व 23 निजी डेंटल कालेजों में बीडीएस की 2300 सीटें हैं। इनमें से 1550 एमबीबीएस व 1150 बीडीएस सीटों के लिए शासन ने 36 हजार रुपये वार्षिक शुल्क निर्धारित किया था। निजी क्षेत्र में एमबीबीएस की 1550 सीटों के लिए कालेजवार 17 लाख से 21 लाख रुपये के बीच और 1150 बीडीएस सीटों के लिए तीन लाख से छह लाख के बीच शुल्क निर्धारित कर दिया गया है।

लेकिन जब छात्र इन कालेजों में पहुंचे तो वहां प्रवेश देने से इन्कार कर दिया गया। साथ ही निजी कालेजों ने समानांतर काउंसिलिंग भी शुरू करा दी। इस पर जिलाधिकारियों के माध्यम से छापे डलवाकर शासन ने रोक लगायी। इस संबंध में यूपी अनएडेड मेडिकल कालेज एसोसिएशन के अध्यक्ष देवमूर्ति का कहना है कि एसोसिएशन ने आधे विद्यार्थियों पर बोझ बढ़ने का तर्क देकर अदालत से गुहार की है।
दरअसल एक ही परीक्षा से सफल होकर कुछ विद्यार्थी 36 हजार शुल्क दें और एक-दो नंबर से पीछे रह गए विद्यार्थी उनका खर्च उठाते हुए दोगुना यानी 21 लाख रुपये तक शुल्क दें, इस बिन्दु का विरोध हुआ था।
पहुंचने वाले विद्यार्थियों की रिपोर्टिग तो सभी कालेजों ने स्वीकार कर ली थी किन्तु प्रवेश हाईकोर्ट के फैसले के बाद ही होगा यह कहा था।
इस संबंध में चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी का कहना है कि विद्यार्थी नॉन सब्सिडाइज्ड सीटों पर भी प्रवेश ले रहे हैं।

Main points of ORDER by UP Highcourt
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(i) Subject  to  what  has  been  held  hereinabove,  the  impugned orders  prescribing  a  Centralized  Counselling  for  all  institutions for  admission  to  MBBS/BDS  medical  courses  in  the  State based on NEET  2016, do not  suffer  from  any error.

(ii)Minority institutions  shall  be allowed  to admit  the  students   of their  community based  on CentralizedCounselling  held  by  the State  on  the  basis  of  NEET  2016,  to  the  extent  permissible,  but, without  deviating from  the merit  of  such students  as  reflected in the  NEET  list  2016,  so  as  to  sub-serve  their  minority  status under  Article 30(1)  of  the Constitution of  India.

(iii) Clause  1  and  2  of  the  order  dated  02.09.2016  shall  not  be given  effect  in  their  present  form,  however,  considering  the laudable  object  behind it, which the State wants  to  achieve  in discharge   of   its  constitutional   obligation,   if   it   chooses   to prescribe subsidized  seats  for  the poor  it  may  do so, but, subject to following conditions:
(a)  it  should  fund  the  subsidy  itself  unless  it  is  able  to  devise any  other  legally  and  constitutionally  permissible  means  of doing so;
(b) in  such  an  eventuality,  it  shall  ensure  that  poor  students are  admitted  against  subsidized  seats  without  compromising merit  i.e.  only  when  such  students  are  within  the  zone  of 0 merit,  in  the  normal  course,  for  exercising  his  choice  during counselling as  per  NEET  list  2016 and not  otherwise;
(c)  reservation  on  the  basis  of  residence  for  the  purposes  of subsidized  seats,  if  the  occasion  so  arises,  shall  be  restricted to  50%  of  the  seats  excluding  the  All  India  Quota  seats  but including   the   seats   in  Government  institutions   and  the number/percentage   of   such   seats   reserved   in   private institutions shall be re-fixed accordingly.; The  State  may  if  it  chooses  reformulate  its  policy  as  aforesaid. If  not,  then  clause  1  and  2  of  the  order  dated  02.09.2016  shall  be treated as  inoperative.

(iv)As  we  have  held  clause  1  and  2  of  the  order  of  the  State dated  02.09.2016  to  be  unsustainable  in  its  present  form  and  as they  provide  the  basic  principle  and  formula  of  fee  fixation, for  seats  in  private  institutions,  therefore,  unless  the  State  reformulates  its  policy  as  aforesaid,  the  orders  passed  by  the fee Committee  based  thereon,  in  respect  of  individual  institutions can  also  not  be  sustained  nor  given  effect,  and  are  accordingly quashed,  therefore,  subject  to  the  above,  the  committee  shall refix the fee chargeable by such institutions, accordingly. It  is  made  clear  that  we  have  not  considered  the  other  grounds of  challenge  to  the  decision  of  fee  committee  raised  in  separate writ  petitions  by  individual  petitioners  and  all  such  pleas  shall be open  to the  parties,  if  the occasion so  arises.

(v)As  a  consequence  of  the  above  Ist  round  of  counselling, which  has  not  yet  been  finalized,  is  required  to  be  held  again.  It is   therefore   provided   that   the  same  shall  be  done  with  expedition  and  the  admission  process  shall  be  completed,  including  the  exercise/steps,  if  any,  referred  at  point  no.  (iii) hereinabove, with  the  same  expedition,  keeping  in  mind  the time  schedule  in  regulation  7(6AA)  of  the  Regulations,  1997 but  no later  than 25.09.2016.

साभार डॉक्टर अमित गुप्ता

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