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Tuesday, December 5, 2017

अग्रिम जमानत लेने तक का अधिकार नहीं, एससी-एसटी कानून के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार

सुप्रीम कोर्ट एससी-एसटी कानून के तहत एकतरफा आरोपों के दुरुपयोग से अधिकारियों को बचाने के लिए बचाव के ऊपाय पर विचार करेगा। शीर्ष अदालत का यह कदम बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि एसएसीटी प्रावधानों के दुरुपयोग के काफी मामले सामने आ रहे हैं। अधिकतर मामलों में आरोप एकतरफा होते हैं। इसके बाद अधिकारियों को इस सख्त कानून के तहत गिरफ्तारी से लेकर मुकदमे तक का सामना करना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सरकार को नोटिस जारी किया है, अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से मदद मांगी है। साथ ही वरिष्ठ अधिवक्ता अमरेंद्र शरण और एए तिवारी से कोर्ट की सहायता करने के लिए कहा है। पीठ ने इसके साथ ही महाराष्ट्र के एक शिक्षा अधिकारी के खिलाफ अभियोजन को भी स्टे कर दिया। मामले की सुनवाई जनवरी में होगी। जस्टिस आदर्श गोयल यूयू ललित की पीठ ने कहा कि हम देखेंगे कि ऐसे क्या प्रक्र्रियात्मक बचाव हो सकते हैं जब एससी/एसटी एक्ट (अत्याचार निवारण), 1989 के प्रावधानों का बाहरी कारणों से लगाए गए आरोपों की वजह से दुरुपयोग नहीं हो। ऐसे आरोप लगाए जाने की स्थिति में आरोपों पर सीधे कार्रवाई करने के बजाए उसमें प्रक्रियात्मक बचाव उपलब्ध हैं या नहीं। पीठ ने कहा कि इस अपील में मौलिक सवाल है कि क्या दुर्भावना का एकतरफा आरोप अधिकारियों पर अभियोजन चलाने का आधार हो सकता है जिन्होंने मामले को सरकारी ओहदे पर रहते हुए देखा हो। यदि ऐसा आरोप झूठा हो तो ऐसे दुरुपयोग के खिलाफ अधिकारी के पास क्या विकल्प हैं। जाहिर है कि यदि आरोपों पर कार्रवाई हो तो अधिकारी को गिरफ्तारी से लेकर अभियोजन तक का सामना करना पड़ सकता है। इसका व्यक्तिगत आजादी के अधिकार पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। हम समझते हैं कि वास्तविक पीड़ित को बचाने के लिए बने इस कानून का ऐसा इरादा नहीं होगा कि किसी को झूठा फंसाया जाए। कोर्ट ने कहा कि हम देखेंगे कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष और न्यायोचित है या नहीं। इस एक्ट में अभियुक्त को अग्रिम जमानत लेने का अधिकार नहीं है। मामले के फार्मेसी कॉलेज के कर्मचारी ने दूसरे कर्मचारी के खिलाफ एससीएसटी एक्ट का मुकदमा लिखवाया था। जब उसके खिलाफ अभियोग की मंजूरी की बात आई तो उचित प्राधिकारी ने मंजूरी देने से मना कर दिया। इस पर कर्मी ने इस प्राधिकारी के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज करवा दिया। इस मुकदमे को बंबई हाईकोर्ट ने खारिज करने से मना कर दिया था।
नई दिल्ली । सीबीआई के क्षमा याचना करने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने उड़ीसा उच्च न्यायालय के एक जज के निवास पर छापा मारने के प्रयास के दौरान उनके साथ जांच एजेंसी के आचरण की आलोचना की।सीबीआई ने बताया कि इस चूक के लिए उसने उड़ीसा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित न्यायाधीश से क्षमा याचना कर ली है और दोनों ने ही इसे स्वीकार कर लिया है। इसके बाद भी शीर्ष अदालत ने जांच एजेंसी के प्रति तल्ख टिप्पणियां कीं। जस्टिस एके सीकरी और अशोक भूषण की पीठ ने कहा, परेशानी सिर्फ पीठासीन जज के साथ उसके आचरण को लेकर है

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