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Saturday, November 21, 2015

यूपी के बजट का हिस्सा बनेगा सातवां वेतन आयोग, 2017 चुनाव के चलते बढ़ीं अफसरों की चुनौतियां

लखनऊ : विकास एजेंडा के आधार पर बजट की तैयारियों में जुटे अफसरों की चुनौतियां सातवें वेतन आयोग ने और बढ़ा दी हैं। अधिकारी यह मानकर चल रहे हैं कि 2017 में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सातवें वेतन आयोग को प्रदेश के अगले बजट का हिस्सा बनाना ही होगा। हां, इतना तय है कि इससे लगभग 16 लाख कर्मचारी व 11 लाख पेंशनर लाभांवित होंगे।

सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट गुरुवार को केंद्रीय वित्त मंत्री के समक्ष पेश की गई है। इसे एक जनवरी 2016 से लागू किया जाना है। राज्य कर्मचारियों के साथ उत्तर प्रदेश सरकार के समझौते में स्पष्ट है कि राज्यकर्मियों को वेतनमान से लेकर भत्ताें तक सभी लाभ केंद्रीय कर्मचारियों के बराबर मिलेंगे। इस तरह केंद्र द्वारा इन संस्तुतियों को स्वीकार किए जाने के बाद सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट को मानना प्रदेश सरकार के लिए जरूरी हो जाएगा। वित्त विभाग के अधिकारियों के मुताबिक केंद्र द्वारा इन संस्तुतियों को स्वीकार किए जाने के बाद प्रदेश सरकार एक समिति गठित करेगी, जो वेतन आयोग की संस्तुतियों के परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश के लिए अपनी संस्तुतियां देगी।

विधानसभा चुनाव के मद्देनजर यह तय माना जा रहा है कि वित्तीय वर्ष 2016-17 में ही राज्य कर्मचारियों को इसका लाभ देना होगा। अधिकारियों द्वारा किए गए आकलन में यह तथ्य निकला है कि राज्य सरकार पर वेतन व पेंशन मिलाकर 24 से 25 हजार करोड़ रुपये का बोझ बढ़ेगा। दरअसल बजट में यूं तो वेतन व पेंशन मद में धनराशि का प्रावधान होता ही है, किन्तु इस बार सातवें वेतन आयोग के मद्देनजर औसतन 25 हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त धनराशि का प्रावधान करना होगा। अधिकारियों ने बजट की प्लानिंग में इन संस्तुतियों को आधार बनाना शुरू कर दिया है। वित्त विभाग के सचिव अजय अग्रवाल की अगुआई में एक टीम इन संस्तुतियों का अध्ययन कर रही है। उसी के आधार पर बजट प्रावधानों को अंतिम रूप दिया जाएगा।

उधर सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट को महज धोखा बताते हुए कर्मचारी संगठनों ने नाराजगी जताई है। संगठनों ने रिपोर्ट की खामियों को दूर करते हुए उसे प्रदेश में भी जल्द लागू करने की मांग की है।

राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद अध्यक्ष हरि किशोर तिवारी ने कहा कि चतुर्थ श्रेणी कर्मियों को 18 सौ और उच्चाधिकारी को ढाई लाख वेतन का प्रस्ताव देश के कर्मचारियों के साथ भद्दा मजाक हैं। वार्षिक वेतन वृद्धि को तीन प्रतिशत से बढ़ाकर पांच प्रतिशत करना होगा। मकान किराया भत्ता के लिए जस्टिस माथुर आयोग ने कई श्रेणियां बनाई थीं जिसे लागू किया जाना चाहिए। इसके अलावा तमाम खामियों को दूर किया जाना चाहिए।

आल इण्डिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे एवं राज्य विद्युत परिषद अभियंता संघ के महासचिव डी सी दीक्षित ने कहा कि दस साल बाद हो रहे वेतन पुनरीक्षण में 15 प्रतिशत से भी कम की वेतनवृद्धि का कोई मतलब नहीं रह जाता है। उन्होंने कहा कि सातवां वेतन आयोग आइएएस का है और इसे देश के चार करोड़ अधिकारियों व कर्मचारियांे में भारी गुस्सा है।

इंडियन पब्लिक सर्विस इम्प्लाइज फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीपी मिश्र ने रिपोर्ट की संस्तुतियों में सुधार करने की मांग केंद्र सरकार से की है।

उन्होंने वन रेंक वन पेंशन को सभी कर्मचारियों पर लागू करने का स्वागत करते हुए कहा कि रिपोर्ट की खामियों को दूर करने के लिए 25 नवंबर को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री व वित्त मंत्री को ज्ञापन दिया जाएगा।

राज्य कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष अजय सिंह व महामंत्री बजरंग बली यादव ने भी वेतन आयोग की रिपोर्ट को कर्मचारियों के साथ अन्याय बताया है। राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के अध्यक्ष एसपी तिवारी और महामंत्री आरके निगम ने रिपोर्ट को आशा के विपरीत बताया कि वेतन भत्ताें में वृद्धि पिछले आयोगों से कम है।

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